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इंसानों की अनदेखी और गायों की मौत का कोलाहल

दरिया में बहते पानी के मानिंद सम्पूर्ण विश्व की मानवजाति आधुनिकता, सुख सुविधा और व्यक्तिगत सुख स्वार्थ सिद्धि की अंधी दौड़ में भागती नजर आ रही है, मजे का पहलू तो ये है की सभी को जीवन शैली में विकास के बड़े मापदंड वो भी पूर्ण और समृद्ध प्राकृतिक संपदा के साथ चाहिए, लेकिन सवाल बड़ा सीधा सहज है की कितनों ने अपने खेत क्यारी, घर की फुलवारी, घर के बड़े बुजुर्गों के लिए और  बेजुबान सदस्य गाय, कुत्ता, पक्षी गण आदि सभी पशुधन के लिए हर दिन क्या थोड़ा समय देना भी निश्चित किया सवाल विचारयोग्य है।

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कुछ समय पहले ही इंसानों की महामारी कोरोना के झन्नाटेदार तमाचे की गूंज से सभी वाकिफ हैं, मैं आहत हूं वर्तमान में उपजे गौ माता के संकट को लेकर जिसका यथायोग्य प्रसारण निजी मिडियाजगत कर ही नहीं रहा क्योंकि उसकी रुचि धन लाभ वाले और मात्र डिबेट टीआरपी मसाला जैसे विषयों पर आधारित होती जा रही है, सानुरोध बताना चाहूंगा के राजस्थान, एम पी, छत्तीसगढ़ आदि कई राज्यों में लंपी नामक घातक वायरस गौ माताओं के लिए काल साबित हो रहा है जिसमे दवाएं अपर्याप्त साबित हो रही हैं मेरे भाइयों हमारे भारत की पहचान गाय गंगा, गीता से आदि काल से रही है ऐसे में हम सभी की भी नैतिक आत्मीय जिम्मेदारी बनती है की जो हो सके तिनका बराबर ही सही अपने आस पास प्रयास अवश्य करें।

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जहां भी गौ माताएं घरों में हैं वहां पर पीसी हल्दी, रोटी में सरसो के तेल से युक्त गुड के साथ गौ माताओं को दिया जाय ये आयुर्वेदिक उपाय शुरुआती संक्रमण में लाभकारी है, शहरों में रहने वाले लोग भी कृपा कर गौ माता के लिए ये गिलहरी प्रयास अवश्य करें, दिलचस्प बात है की, गौ माताओं ने मानवजाति को दो नहीं बल्कि चार स्तनों से दूध पिलाकर पोषित पल्लवित किया है, सरकारी आयोजनों और फीता काटो कार्यक्रमों से ध्यान हटाकर वर्तमान केन्द्र और राज्य सरकारो को भी इस गंभीर विषय पर तत्काल प्रभाव से बड़े एक्शन लेने की प्रचंड आवश्यकता है, हमारी गौ माता का विषय राष्ट्रीय अस्मिता प्रतिष्ठा का विषय है, इस विषय पर अधिक से अधिक जन जागरण की आवश्यकता है।

भारत माता की जय,
गौ माता की जय जय हिंद,

अंकित सिंह (रुद्र प्रताप)
एसिटेंट प्रोफेसर पत्रकारिता जनसंचार

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