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जानें हरतालिका तीज व्रत का महत्‍व, क्‍या है पूरी कथा

हरतालिका तीज व्रत हिन्दू धर्म में सबसे बड़ा व्रत माना जाता हैं।
यह तीज का त्यौहार भाद्रपद मास शुक्ल की तृतीया तिथि को मनाया जाता है।

खासतौर पर महिलाओं द्वारा यह त्यौहार मनाया जाता हैं।
कम उम्र की लड़कियों के लिए भी यह हरतालिका का व्रत श्रेष्ठ समझा गया हैं।

विधि-विधान से हरितालिका तीज का व्रत करने से जहाँ कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है,
वहीं विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य मिलता है।

 हरतालिका तीज में भगवान शिव, माता गौरी
एवम गणेश जी की पूजा का महत्व हैं। यह व्रत निराहार एवं निर्जला किया जाता हैं।
शिव जैसा पति पाने के लिए कुँवारी कन्या इस व्रत को विधि विधान से करती हैं।

संकल्प शक्ति बढाता है हरितालिका तीज का व्रत

हरितालिका तीज का व्रत महिला प्रधान है। इस दिन महिलायें बिना कुछ खायें -पिये व्रत रखती है।
यह व्रत संकल्प शक्ती का एक अनुपम उदाहरण है।
संकल्प अर्थात किसी कर्म के लिये मन मे निश्चित करना कर्म का मूल संकल्प है।
इस प्रकार संकल्प हमारी अन्तरीक शक्तियों का सामोहिक निश्चय है।
इसका अर्थ है-व्रत संकल्प से ही उत्पन्न होता है।

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व्रत का संदेश यह है कि हम जीवन मे लक्ष्य प्राप्ति का संकल्प लें।
संकल्प शक्ति के आगे असंम्भव दिखाई देता लक्ष्य संम्भव हो जाता है।
माता पार्वती ने जगत को दिखाया की संकल्प शक्ति के सामने ईश्वर भी झुक जाता है।

अच्छे कर्मो का संकल्प सदा सुखद परिणाम देता है।
इस व्रत का एक सामाजिक संदेश विषेशतः महिलाओं के संदर्भ मे यह है कि
आज समाज मे महिलायें बिते समय की तुलना मे अधिक आत्मनिर्भर व स्वतंत्र है।
महिलाओं की भूमिका मे भी बदलाव आये है।
घर से बाहर निकलकर पुरुषों की भाँति सभी कार्य क्षेत्रों मे सक्रिय है।
ऎसी स्थिति मे परिवार व समाज इन महिलाओं की भावनाओ
एवं इच्छाओं का सम्मान करें, उनका विश्वास बढाएं,
ताकि स्त्री व समाज सशक्त बनें।

व्रत विधि और नियम

हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता हैं। प्रदोष काल अर्थात दिन रात के मिलने का समय। हरतालिका पूजन के लिए शिव,
पार्वती, गणेश एव रिद्धि सिद्धि जी की प्रतिमा बालू रेत अथवा काली मिट्टी से बनाई जाती हैं।

विविध पुष्पों से सजाकर उसके भीतर रंगोली डालकर उस पर चौकी रखी जाती हैं। चौकी पर एक अष्टदल बनाकर उस पर थाल रखते हैं।


उस थाल में केले के पत्ते को रखते हैं। सभी प्रतिमाओ को केले के पत्ते पर रखा जाता हैं।
सर्वप्रथम कलश के ऊपर नारियल रखकर लाल कलावा बाँध कर
पूजन किया जाता हैं  कुमकुम, हल्दी, चावल, पुष्प चढ़ाकर विधिवत पूजन होता हैं।
कलश के बाद गणेश जी की पूजा की जाती हैं।

उसके बाद शिव जी की पूजा जी जाती हैं।
तत्पश्चात माता गौरी की पूजा की जाती हैं।
उन्हें सम्पूर्ण श्रृंगार चढ़ाया जाता हैं। इसके बाद अन्य देवताओं का आह्वान कर षोडशोपचार पूजन किया जाता है।

पढें कथा

इसके बाद हरतालिका व्रत की कथा पढ़ी जाती हैं।
इसके पश्चात आरती की जाती हैं जिसमे सर्वप्रथम गणेश जी की पुनः शिव जी की फिर माता गौरी की आरती की जाती हैं।
इस दिन महिलाएं रात्रि जागरण भी करती हैं और कथा-पूजन के साथ कीर्तन करती हैं।

प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को सभी प्रकार की
वनस्पतियां जैसे बिल्व-पत्र, आम के पत्ते, चंपक के पत्ते एवं केवड़ा अर्पण किया जाता है।
आरती और स्तोत्र द्वारा आराधना की जाती है।
हरतालिका व्रत का नियम हैं कि इसे एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता।

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प्रातः अन्तिम पूजा के बाद माता गौरी को जो सिंदूर चढ़ाया जाता हैं
उस सिंदूर से सुहागन स्त्री सुहाग लेती हैं।
ककड़ी एवं हलवे का भोग लगाया जाता हैं।
उसी ककड़ी को खाकर उपवास तोडा जाता हैं।
अंत में सभी सामग्री को एकत्र कर पवित्र नदी एवं कुण्ड में विसर्जित किया जाता हैं।

भगवती-उमा की पूजा के लिए ये मंत्र बोलना चाहिए

उमायै नम:

पार्वत्यै नम:

जगद्धात्र्यै नम:

जगत्प्रतिष्ठयै नम:

शांतिरूपिण्यै नम:

शिवायै नम:

भगवान शिव की आराधना इन मंत्रों से करनी चाहिए

हराय नम:

महेश्वराय नम:

शम्भवे नम:

शूलपाणये नम:

पिनाकवृषे नम:

शिवाय नम:

पशुपतये नम:

महादेवाय नम:

निम्न नामो का उच्चारण कर बाद में पंचोपचार या सामर्थ्य हो तो षोडशोपचार विधि से पूजन किया जाता है।
पूजा दूसरे दिन सुबह समाप्त होती है, तब महिलाएं द्वारा अपना
व्रत तोडा जाता है और अन्न ग्रहण किया जाता है।

हरतालिका तीज व्रत पूजन की सामग्री

1- फुलेरा विशेष प्रकार से  फूलों से सजा होता है।

2- गीली काली मिट्टी अथवा बालू रेत।

3- केले का पत्ता।

4- विविध प्रकार के फल एवं फूल पत्ते।

5- बेल पत्र, शमी पत्र, धतूरे का फल एवं फूल, तुलसी मंजरी।

6- जनेऊ , मौली, वस्त्र,।

7- माता गौरी के लिए पूरा सुहाग का सामग्री, जिसमे चूड़ी, बिछिया,
काजल, बिंदी, कुमकुम, सिंदूर, कंघी, महावर, मेहँदी आदि एकत्र की जाती हैं।
इसके अलावा बाजारों में सुहाग पूड़ा मिलता हैं जिसमे सभी सामग्री होती हैं।

8- घी, तेल, दीपक, कपूर, कुमकुम, सिंदूर, अबीर, चन्दन, नारियल, कलश।

9- पञ्चामृत – घी, दही, शक्कर, दूध, शहद।

हरतालिका तीज व्रत कथा

भगवान शिव ने पार्वतीजी को उनके पूर्व जन्म का
स्मरण कराने के उद्देश्य से इस व्रत के माहात्म्य की कथा कही थी।

श्री भोलेशंकर बोले हे गौरी पर्वतराज हिमालय पर स्थित
गंगा के तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में बारह वर्षों
तक अधोमुखी होकर घोर तप किया था।

इतनी अवधि तुमने अन्न न खाकर पेड़ों के सूखे पत्ते चबा कर व्यतीत किए। माघ की विक्राल शीतलता में तुमने निरंतर जल में प्रवेश करके तप किया। वैशाख की जला देने वाली गर्मी में तुमने पंचाग्नि से शरीर को तपाया। श्रावण की मूसलधार वर्षा में खुले आसमान के नीचे बिना अन्न-जल ग्रहण किए समय व्यतीत किया।

तुम्हारे पिता तुम्हारी कष्ट साध्य तपस्या को देखकर बड़े दुखी होते थे।
उन्हें बड़ा क्लेश होता था। तब एक दिन तुम्हारी तपस्या तथा पिता के क्लेश को देखकर नारदजी तुम्हारे घर पधारे। तुम्हारे पिता ने हृदय से अतिथि सत्कार करके उनके आने का कारण पूछा।

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नारदजी ने कहा- गिरिराज मैं भगवान विष्णु के भेजने पर
यहां उपस्थित हुआ हूं। आपकी कन्या ने बड़ा कठोर तप किया है।
इससे प्रसन्न होकर वे आपकी सुपुत्री से विवाह करना चाहते हैं। इस संदर्भ में पकी राय जानना चाहता हूं।

नारदजी की बात सुनकर गिरिराज गद्‍गद हो उठे। उनके तो जैसे सारे क्लेश ही दूर हो गए।
प्रसन्नचित होकर वे बोले- श्रीमान्‌ यदि स्वयं विष्णु
मेरी कन्या का वरण करना चाहते हैं तो भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है।
वे तो साक्षात ब्रह्म हैं। हे महर्षि! यह तो हर पिता की इच्छा होती है कि उसकी पुत्री सुख-सम्पदा से युक्त पति के घर की लक्ष्मी बने।
पिता की सार्थकता इसी में है कि पति के घर जाकर उसकी पुत्री पिता के घर से अधिक सुखी रहे।

तुम्हारे पिता की स्वीकृति पाकर नारदजी विष्णु के पास गए और उनसे तुम्हारे ब्याह के निश्चित होने का समाचार सुनाया।
मगर इस विवाह संबंध की बात जब तुम्हारे कान में पड़ी तो तुम्हारे दुख का ठिकाना न रहा।

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तुम्हारी एक सखी ने तुम्हारी इस मानसिक दशा को समझ लिया और उसने तुमसे उस विक्षिप्तता का कारण जानना चाहा।
तब तुमने बताया – मैंने सच्चे हृदय से भगवान शिवशंकर का वरण किया है, किंतु मेरे पिता ने मेरा विवाह विष्णुजी से निश्चित कर दिया।
मैं विचित्र धर्म-संकट में हूं।
अब क्या करूं? प्राण छोड़ देने के अतिरिक्त अब कोई भी
उपाय शेष नहीं बचा है। तुम्हारी सखी बड़ी ही समझदार और सूझबूझ वाली थी।

उसने कहा- सखी! प्राण त्यागने का इसमें कारण ही क्या है? संकट के मौके पर धैर्य से काम लेना चाहिए।
नारी के जीवन की सार्थकता इसी में है कि पति-रूप में
हृदय से जिसे एक बार स्वीकार कर लिया, जीवनपर्यंत उसी से निर्वाह करें।

सच्ची आस्था और एकनिष्ठा के समक्ष तो ईश्वर को भी समर्पण करना पड़ता है। मैं तुम्हें घनघोर जंगल में ले चलती हूं, जो साधना स्थली भी हो और जहां तुम्हारे पिता तुम्हें खोज भी न पाएं। वहां तुम साधना में लीन हो जाना। मुझे विश्वास है कि ईश्वर अवश्य ही तुम्हारी सहायता करेंगे।

तुमने ऐसा ही किया। तुम्हारे पिता तुम्हें घर पर न पाकर बड़े दुखी तथा चिंतित हुए। वे सोचने लगे कि तुम जाने कहां चली गई।
मैं विष्णुजी से उसका विवाह करने का प्रण कर चुका हूं।

यदि भगवान विष्णु बारात लेकर आ गए और कन्या घर पर न हुई तो बड़ा अपमान होगा।
मैं तो कहीं मुंह दिखाने के योग्य भी नहीं रहूंगा।
यही सब सोचकर गिरिराज ने जोर-शोर से तुम्हारी खोज शुरू करवा दी।

इधर तुम्हारी खोज होती रही और उधर तुम अपनी
सखी के साथ नदी के तट पर एक गुफा में मेरी आराधना में लीन थीं।
भाद्रपद शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र था।
उस दिन तुमने रेत के शिवलिंग का निर्माण करके व्रत किया।

रात भर मेरी स्तुति के गीत गाकर जागीं।
तुम्हारी इस कष्ट साध्य तपस्या के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मेरी समाधि टूट गई।
मैं तुरंत तुम्हारे समक्ष जा पहुंचा और तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर तुमसे वर मांगने के लिए कहा।

तब अपनी तपस्या के फलस्वरूप मुझे अपने
समक्ष पाकर तुमने कहा – मैं हृदय से आपको पति के रूप में वरण कर चुकी हूं।
यदि आप सचमुच मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर
आप यहां पधारे हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार कर लीजिए।

तब मैं ‘तथास्तु’ कह कर कैलाश पर्वत पर लौट आया। प्रातः होते ही तुमने पूजा की समस्त सामग्री को नदी में प्रवाहित करके अपनी सहेली सहित व्रत का पारणा किया।
उसी समय अपने मित्र-बंधु व दरबारियों सहित गिरिराज तुम्हें खोजते-खोजते वहां आ पहुंचे और तुम्हारी इस कष्ट साध्य
तपस्या का कारण तथा उद्देश्य पूछा।
उस समय तुम्हारी दशा को देखकर गिरिराज
अत्यधिक दुखी हुए और पीड़ा के कारण उनकी आंखों में आंसू उमड़ आए थे।

तुमने उनके आंसू पोंछते हुए विनम्र स्वर में कहा- पिताजी! मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय कठोर तपस्या में बिताया है।
मेरी इस तपस्या का उद्देश्य केवल यही था कि मैं महादेव को पति के रूप में पाना चाहती थी। आज मैं अपनी तपस्या की कसौटी पर खरी उतर चुकी हूं।

आप क्योंकि विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निर्णय ले चुके थे, इसलिए मैं अपने आराध्य की खोज में घर छोड़कर चली आई।
अब मैं आपके साथ इसी शर्त पर घर जाऊंगी कि आप मेरा विवाह विष्णुजी से न करके महादेवजी से करेंगे।

गिरिराज मान गए और तुम्हें घर ले गए।
कुछ समय के पश्चात शास्त्रोक्त विधि-विधानपूर्वक उन्होंने हम दोनों को विवाह सूत्र में बांध दिया।

हे पार्वती भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को तुमने मेरी
आराधना करके जो व्रत किया था,
उसी के फलस्वरूप मेरा तुमसे विवाह हो सका।
इसका महत्व यह है कि मैं इस व्रत को करने वाली
कुंआरियों को मनोवांछित फल देता हूं।
इसलिए सौभाग्य की इच्छा करने वाली प्रत्येक युवती को यह व्रत पूरी एकनिष्ठा तथा आस्था से करना चाहिए।

हरतालिका तीज व्रत पूजा विधि

यह व्रत प्रदोषकाल में किया जाता है।
सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त को प्रदोषकाल कहा जाता है।
यह दिन और रात के मिलन का समय होता है।

तीज पूजन के लिए भगवान शिव, माता पार्वती और
भगवान गणेश की बालू रेत व काली मिट्टी की प्रतिमा हाथों से बनाएं।

पूजा स्थल को फूलों से सजाकर एक चौकी
रखें और उस चौकी पर केले के पत्ते रखकर भगवान शंकर, माता पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें।

इसके बाद देवताओं का आह्वान करते हुए भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश का षोडशोपचार पूजन करें।

सुहाग की पिटारी में सुहाग की सारी वस्तु रखकर माता पार्वती को चढ़ाना इस व्रत की मुख्य परंपरा है।

 इसमें शिव जी को धोती और अंगोछा चढ़ाया जाता है।
यह सुहाग सामग्री सास के चरण स्पर्श करने के बाद ब्राह्मणी और ब्राह्मण को दान देना चाहिए।

इस प्रकार पूजन के बाद कथा सुनें और रात्रि जागरण करें।
आरती के बाद सुबह माता पार्वती को सिंदूर चढ़ाएं व ककड़ी-हलवे का भोग लगाकर व्रत खोलें।

हरितालका तीज पूजा मुहूर्त

हरितालिका पूजन प्रातःकाल ना करके प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त में किया जाना ही शास्त्रसम्मत है।

प्रदोषकाल निकालने के लिये आपके स्थानीय
सूर्यास्त में आगे के 96 मिनट जोड़ दें तो यह
एक घंटे 36 मिनट के लगभग का समय प्रदोष काल माना जाता है।

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