करोड़ों के व्यापार के बावजूद टैक्स अदायगी के नाम पर जीरो जबकि उपभोक्ताओं से वसूलते हैं पूरा टैक्स 

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लखनऊ। कहा जाता है कि देश की तरक्की में करदाताओं का बहुत बड़ा योगदान होता है। पूरे देश की आर्थिक स्थिति वहां के कर देने वाले लोगों पर ही निर्भर करती है। जिस देश में जितने ईमानदार कर देने वाले होंगे वहां की तरक्की दिन दूना रात चौगुना होने में देर नहीं लगती।

आज दुनिया में जितने भी विकसित देश है वहां ईमानदारी से टैक्स देने वालों की तादाद बहुत बड़ी है। इसी को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने टैक्स अदायगी को सरल करते हुए जीएसटी का फार्मूला पूरे देश में लागू किया था, जिससे कि टैक्स देने वालों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ राजस्व में भी बढ़ोतरी हो । परंतु हमारे देश का दुर्भाग्य की टैक्स देने वालों की संख्या में तो इजाफा हुआ परंतु राजस्व में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं आया। जिसका सबसे मुख्य कारण टैक्स की चोरी है।
आज पूरे देश में केवल नौकरी पेशा लोग ही इमानदारी से टैक्स भर रहे हैं दूसरी ओर व्यापारी वर्ग को टैक्स चोरी में इतनी महारत हासिल है कि वह व्यापार तो लाखों करोड़ों का कर रहा है, परंतु टैक्स के नाम पर अब भी गरीब बना है। वह अपना लेखा-जोखा मेंटेन करने वाले (अकाउंटेंट) के सहारे करोड़ों के व्यापार को आसानी से हजारों में दर्शा देता है। जिससे कि उसका टैक्स न्यूनतम हो जाता है।

और यह खेल मुख्य शहर से सटे हुए कस्बों में खूब होता है। इसी में राजधानी से लगा हुआ बन्थरा का हरौनी कस्बा आता है, जो कि रेलवे स्टेशन होने की वजह से कई किलोमीटर दायरे का मुख्य बाजार है। यहां पर मिठाई, कपड़े, इलेक्ट्रिकल्स के अलावा कई प्रकार के व्यापारी अपना- अपना प्रतिष्ठान स्थापित किए हुए हैं। जिनमें इलेक्ट्रिकल्स की दुकानें मुख्य रूप से बड़ी-बड़ी हैं। जिनका कारोबार वार्षिक तिमाही में कई लाख रुपए के ऊपर तक हो जाता है। परंतु टैक्स के मामले में यह व्यापारी अभी भी गरीब ही बने हुए हैं। इनकी दुकानों में वैसे तो करोड़ों का माल भरा हुआ है, परंतु वह कागजों पर केवल कुछ हजारों का ही दर्शा रहे हैं। यह व्यापारी पूरे वर्ष कच्चे बिल पर ही व्यापार किया करते हैं। और समय आने पर मनमाने दर पर बिलों की भरपाई करते हुए टैक्स में घपले बाजी कर बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार में लिप्त है।
इसी प्रकार दूसरे इलाकों का भी टैक्स का हाल कमोबेश यही है। जो कि देश की तरक्की का मुख्य बाधक है। जिसके परिणाम स्वरूप उपभोक्ता तो टैक्स देकर पिस रहा है, परंतु व्यापारी घपले बाजी करते हुए टैक्स चोरी करके बहुत बड़े  भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता रहता है।