श्राद्ध पक्ष में किन बातों का रखें ध्‍यान, जानें श्राद्ध कर्म की पूरी विधि  

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पितृ दोष से मुक्ति पाने का सबसे सही समय होता है पितृपक्ष। इस दौरान किए गए श्राद्ध कर्म और दान-तर्पण से पितृों को तृप्ति मिलती है।
वे खुश होकर अपने वंशजों को सुखी और संपन्न जीवन का आशीर्वाद देते हैं।
पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म करने की परंपरा हमारी सांस्कृतिक विरासत है।
इस साल श्राद्ध 25 सितंबर से शुरू हो रहे हैं।

श्राद्ध करने के अपने नियम होते हैं।
श्राद्ध पक्ष हिंदी कैलेंडर के अश्विन महीने के कृष्ण पक्ष में आता है।
जिस तिथि में जिस परिजन की मृत्यु हुई हो, उसी तिथि में उनका श्राद्ध कर्म किया जाता है।
श्राद्ध कर्म पूर्ण विश्वास, श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए।
पितृों तक केवल हमारा दान ही नहीं बल्कि हमारे भाव भी पहुंचते हैं।

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किसका कब करें श्राद्ध

जिन लोगों की मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो,
उनका श्राद्ध अमावस्या तिथि को करना चाहिए।
सांप काटने से मृत्यु और बीमारी में या अकाल मृत्यु होने पर भी
अमावस्या तिथि को श्राद्ध किया जाता है।
जिनकी आग से मृत्यु हुई हो या जिनका अंतिम संस्कार न किया जा सका हो,
उनका श्राद्ध भी अमावस्या को करते हैं।

जिसने आत्महत्या की हो, जिसकी हत्या हुई हो,
ऐसे लोगों का श्राद्ध चतुर्थी तिथि को किया जाता है।
जिन लोगों की चतुर्थी तिथि में मृत्यु हुई है
उनका तर्पण भी इसी तिथि को किए जाने का विधान है।

एक साल में 96 अवसर मिलते हैं श्राद्ध के

शास्त्रों के अनुसार, अपने पितृगणों का श्राद्ध कर्म करने के लिए एक साल में 96 अवसर मिलते हैं।
इनमें साल के बारह महीनों की 12 अमावस्या तिथि को श्राद्ध किया जा सकता है।
साल की 14 मन्वादि तिथियां, 12 व्यतिपात योग, 12 संक्रांति, 12 वैधृति योग और 15 महालय शामिल हैं। इनमें पितृपक्ष का श्राद्ध कर्म उत्तम माना गया है

पूर्णिमा से अमावस्या के ये 15 दिन पितरों को कहे जाते हैं।
इन 15 दिनों में पितरों को याद किया जाता है और उनका तर्पण किया जाता है।
इस साल 24 से 8 अक्टूबर तक हैं।
पितरों को खुश रहने के लिए श्राद्ध के दिनों में विशेष कार्य करना चाहिए
वही इस दौरान कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है।

इन बातों का रखें ध्‍यान

  1. श्राद्ध करने के लिए ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे शास्त्रों में बताया गया है कि दिवंगत पितरों के परिवार में या तो ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र और अगर पुत्र न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य ही तिलांजलि और पिंडदान देने के पात्र होते हैं।

पितरों के निमित्त सारी क्रियाएं गले में दाये कंधे मे जनेउ डाल कर और दक्षिण की ओर मुख करके की जाती है।

  1. कई ऐसे पितर भी होते है जिनके पुत्र संतान नहीं होती है या फिर जो संतान हीन होते हैं।
    ऐसे पितरों के प्रति आदर पूर्वक अगर उनके भाई भतीजे, भांजे या अन्य चाचा ताउ के परिवार के पुरूष सदस्य पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान, अन्नदान और वस्त्रदान करके ब्राह्मणों से विधिपूर्वक श्राद्ध कराते है तो पितर की आत्मा को मोक्ष मिलता है।
  2. श्राद्ध के दिन लहसुन, प्याज रहित सात्विक भोजन ही घर की रसोई में बनना चाहिए। जिसमें उड़द की दाल, बडे, चावल, दूध, घी से बने पकवान, खीर, मौसमी सब्जी जैसे तोरई, लौकी, सीतफल, भिण्डी कच्चे केले की सब्जी ही भोजन में मान्य है। आलू, मूली, बैंगन, अरबी तथा जमीन के नीचे पैदा होने वाली सब्जियां पितरों को नहीं चढ़ती है।
  3. श्राद्ध का समय हमेशा जब सूर्य की छाया पैरो पर पड़ने लग जाए यानी दोपहर के बाद ही शास्त्र सम्मत है। सुबह-सुबह अथवा 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता है।

    जानें तारीख

24 सितंबर 2018 को पूर्णिमा श्राद्ध

25 सितंबर 2018 प्रतिपदा श्राद्ध

26 सितंबर 2018 द्वितीय श्राद्ध

27 सितंबर 2018 तृतिया श्राद्ध

28 सितंबर 2018 चतुर्थी श्राद्ध

29 सितंबर 2018 पंचमी श्राद्ध

30 सितंबर 2018 षष्ठी श्राद्ध

1 अक्टूबर 2018 सप्तमी श्राद्ध

2 अक्टूबर 2018 अष्टमी श्राद्ध

3 अक्टूबर 2018 नवमी श्राद्ध

4 अक्टूबर 2018 दशमी श्राद्ध

5 अक्टूबर 2018 एकादशी श्राद्ध

6 अक्टूबर 2018 द्वादशी श्राद्ध

7 अक्टूबर 2018 त्रयोदशी श्राद्ध, चतुर्दशी श्राद्ध

8 अक्टूबर 2018 सर्वपितृ अमावस्या।