जानिए निर्जला एकादशी भीमसेनी एकादशी का महत्वम, महर्षि पाराशर ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य राकेश पाण्डेय से

244

एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्यास्त तक जल ग्रहण न करने के कारण इसे निर्जला एकादशी कहते है। वर्ष की चौबीस एकादशियों में से ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सर्वोत्तम मानी गयी है।

विशेष – एकादशी व्रत महत्व, दशमी युक्त एकादशी विद्धा कहलाती है व एकादशी युक्त द्वादशी शुद्धा कहलाती है। चूँकि 23 जून शनिवार को प्रातः 05:50 तक दशमी तिथि है जो सूर्योदय के पश्चात तक है। इस वर्ष 24 जून रविवार को एकादशी युक्त द्वादशी है जो अत्यन्त ही शुद्ध है अतः एकादशी तिथि का मान सबके लिए 24 जून रविवार को ही माना जायेगा।

इस एकादशी का  व्रत  रखने  से सभी  एकादशियों के व्रतों के फल की प्राप्ति सहज ही हो जाती है। व्रत विधान – ज्येष्ठ माष के दिन बड़े होते है, दूसरे गर्मी की अधिकता के कारण बार-बार प्यास लगती है क्योकि इस दिन जल नहीं पिया जाता इसलिए यह व्रत अत्यधिक श्रम-साध्य होने के साथ- साथ कष्ट एवं संयम – साध्य भी है। जल पान के निषिद्ध होने पर भी इस व्रत में फलाहार के पश्चात दूध पीने का विधान है। इस दिन व्रत करने वाले को चाहिए की वह जल से कलश को भरे। उस पर सफ़ेद वस्त्र से ढक्कन रखे। उस के ऊपर शर्करा तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मणों को दान दें।

इस एकादशी का व्रत करके यथा सम्भव अन्न,छतरी,जूता,पंखी तथा फलादि का दान करना चाहिए। इस दिन निर्जल व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। इस दिन विधि पूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार के दान-भाव में, “सर्वभूत हिते रताः” की भावना चरितार्थ होती है।

इसी व्रत को करके भीमसेन ने दश हजार हाथियों का बल प्राप्त कर दुर्योधन के ऊपर विजय प्राप्त की। यह व्रत बाल वृद्ध और रोगी को नहीं करना चाहिए। आज के परिवेश में जहा जल ही जीवन है एसा कहा जाता है जल के विना अगर प्राण संकट में हो जाये तो” ॐ नमो नारायणाय “मन्त्र का 12 बार जप करके थाली में जल रखकर घुटने और भुजा को जमीन पर लगाकर पशुवत जल पी लेना चाहिए इससे व्रत भंग नहीं होता है।