समीक्षा : महज इत्तेफाक या भाजपा की नीतियों में कमी

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देवेंद्र तिवारी “रिंकू”

उपचुनावों में भाजपा को एक बार फिर हार का मुंह देखना पड़ा। चार लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर हुए चुनावों में भाजपा को महज दो सीटें ही हाथ लगीं। इसे महज इत्तेफाक कहा जाएगा या भाजपा की रणनीति, उसकी नीतियों कमी और जनता के बीच उनके सांसदों, विधायकों की गैरमौजूदगी, कि जनता ने लगातार तीसरी बार उपचुनावों में उनको नकार दिया। आखिर ऐसा क्या हो गया कि लगातार एक के बाद एक हो रहे उपचुनावों में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ रहा है। भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान अपनी कैराना सीट पर हार के कारण हुआ है। भाजपा सांसद हुकुम सिंह की मौत के बाद खाली हुई सीट पर उनकी बेटी मृगांका सिंह ने चुनाव लड़ा लेकिन उनको भी इससे कोई फायदा नहीं हुआ। वह जनता से कोई भी सहानुभूति हासिल नहीं कर पाईं और यह सीट भाजपा के हाथ से निकल गई।

जादुई प्रतिभा के धनी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हवा भी विपक्ष के गठजोड़ के आगे फेल साबित हो रही है। कर्नाटक चुनाव में भले ही भाजपा सबसे सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी हो लेकिन वहां पर विपक्षी पार्टियों का गठबंधन हावी रहा और भाजपा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा। 2014 में सत्ता में आने के बाद से भाजपा के उपचुनावों के सफर पर नजर डालें तो पार्टी को बहुत सफलता नहीं मिली है। अभी तक हुए उपचुनावों में भाजपा ने 23 में से सिर्फ 4 ही सीटें जीती हैं। मगर बात को नकारा नहीं जा सकता कि भाजपा को उपचुनाव में तो हार मिलती है, लेकिन मुख्य चुनाव में वह जीत जाती है। इसीलिए इस वक्त गिने-चुने राज्यों को छोड़कर करीब-करीब पूरे भारत पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों का राज है।

उपचुनावों की बात करें तो भाजपा को यूपी में ये तीसरी बार झटका लगा है। इससे पहले गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव में भाजपा दोनों सीट हार गई थी। कैराना भाजपा के लिए तीसरा झटका है। कैराना का चुनाव इसीलिए भी अहम माना जा रहा था क्योंकि यहां विपक्षी पार्टियों ने भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर चुनाव लड़ा। चर्चा तो यहां तक है कि कैराना का उपचुनाव 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले संयुक्त गठबंधन और भाजपा की टक्कर का लिटमस टेस्ट है। हालांकि, अभी ये कहना जल्दबाजी होगी कि 2019 के लोकसभा चुनावों में ये लिटमस टेस्ट पूरी तरह सफल होगा और मोदी-शाह के विजय रथ को रोक पाएगा। आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो पाएंगे कि उपचुनावों में जहां भाजपा चार सीटों पर जीत पाई तो वहीं कांग्रेस ने उपचुनावों में अब तक पांच सीटों पर जीत हासिल की है।

इस बार के उपचुनावों की एक और खास बात जो रही, और भाजपा की चिंता का एक प्रमुख कारण भी बना, वह यह है कि इस बार भाजपा का वोट शेयर भी गिर गया है। पिछली बार 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान हुए आम चुनाव में पार्टी को 50.6 प्रतिशत वोट मिले थे। अगर पार्टी यह प्रदर्शन दोहरा पाती तो कोई उसके सामने टिक नहीं पाता। हालांकि, एकजुट विपक्ष ने गोरखपुर और फूलपुर की तरह यहां भी भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। भाजपा को इस उप चुनाव में 46.5 प्रतिशत वोट ही मिले। वोट शेयर का गिरना सिर्फ यूपी तक ही सीमित नहीं है। महाराष्ट्र के पालघर और भंडारा-गोंदिया लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में भी भाजपा का वोट शेयर क्रमशः 23 प्रतिशत और 9 प्रतिशत कम हुआ। हालांकि, यहां एक पेच यह है कि 2014 में भाजपा और शिवसेना ने मिलकर चुनाव लड़ा था, इसलिए दोनों का वोट शेयर जुड़ गया था। ऐसे में असल में भाजपा का वोट प्रतिशत कितना कम हुआ, इस बात का सटीक अंदाजा लगाना थोड़ा मुश्किल है।

10 विधानसभा सीटों पर वोट शेयर का आकलन करें तो पता चलता है कि अधिकतर मामलों में बीजेपी का वोट प्रतिशत कम हुआ है। हालांकि, पश्चिम बंगाल के महेशताला में ऐसा नहीं हुआ, जहां पार्टी ने सीपीएम को पीछे करते हुए दूसरा स्थान हासिल किया। यही ट्रेंड हाल में हुए निकाय चुनाव में नजर आया था। भाजपा के लिए थोड़ी राहत की खबर यूपी के नूरपुर से भी है।

भाजपा को भले ही यहां समाजवादी पार्टी से शिकस्त मिली हो, लेकिन उसका वोट शेयर पिछले साल विधानसभा चुनाव में मिले 39 पर्सेंट से बढ़कर 47.2 प्रतिशत हो गया है। हालांकि, एकजुट विपक्ष की ताकत का सामना करने के लिए यह वोट शेयर भी नाकाफी रहा। बड़े राज्यों को छोड़ दें तो भाजपा के लिए चिंता की खबर केरल के चेंगनुर से भी है। यहां पार्टी को 2016 विधानसभा चुनाव में 29.3 प्रतिशत वोट मिले थे। इस उप चुनाव में यह घटकर 23.2 प्रतिशत रह गया।

कर्नाटक में हाल ही में सरकार गिरने की वजह से हुई शर्मिंदगी के बाद भाजपा को एक और बुरी खबर मिली। बेंगलुरु की आरआर नगर सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस को जीत मिली। यहां कांग्रेस का वोट शेयर भी बढ़ा है। जेडीएस और कांग्रेस के गठबंधन को ‘अनैतिक’ बताने वाली भाजपा के लिए यह किसी झटके से कम नहीं।