प्रधानमंत्री की स्वरोजगार योजना को लगातार बैंक दिखा रहे ठेंगा, दर-दर भटक रहे आवेदक  

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लखनऊ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव के समय गरीबों एवं बेरोजगारों को रोजगार देने की महत्वपूर्ण बात कही थी।
चाहे वह सरकारी नौकरियां हों,
किसी प्राइवेट कंपनी में नौकरी हो या किसी दूसरे तरीके से रोजगार देना या सक्षम शिक्षित नवयुवकों को बैंकों द्वारा कुछ पूंजी उपलब्ध करवा कर किसी रोजगार में लगाना।
प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी के अंतर्गत यह महत्वपूर्ण योजना लागू की गई है।

परंतु अधिकतर मामलों में लाभार्थी विकासखंडों या बैंकों के चक्कर ही लगाते रह जाते हैं।
वह किसी भी प्रकार यदि ब्लॉक स्तर से अपनी फाइल मंजूर करवा कर बैंक तक ले आते हैं तो बैंक कर्मी तरह तरह की बहानेबाजी बताकर युवाओं को टरकाया करते हैं।

जिससे उनका मन सरकार की महत्वपूर्ण योजनाओं की ओर से खिन्न हो जाता है एवं सरकार के प्रति उनका रुख़ सरकार की छवि को धूमिल करने वाला बनता है।
परंतु बैंकों को इससे कोई लेना-देना नहीं रहता है सरकार की ओर से जारी किसी भी फरमान का इनको मानना न मानना इनकी मर्जी पर निर्भर करता है।

ज्ञात हो कि प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत शिक्षित बेरोजगारों को मुद्रा लोन की व्यवस्था की गई है जो 200000 तक बिना किसी गारंटी के लाभार्थियों को दिया जाता है।

परंतु बैंक अपनी मनमर्जी के हिसाब से इस योजना का क्रियान्वयन करते हैं अक्सर देखा जाता है कि इस स्थिति में कुछ पूंजीपति लोग ही इस योजना का लाभ ले पा रहे हैं किंतु जो लोग वास्तव में बेरोजगार हैं और पढ़े लिखे भी हैं उनको बैंक केवल टरकाया ही करते हैं।

ताजा मामला राजधानी के ब्लॉक सरोजिनी नगर के गांव रामदासपुर का है यहां की निवासिनी रुचि तिवारी पत्नी अंकुर तिवारी जोकि ग्रेजुएट है इन्होंने बेरोजगार होने की वजह से अपने लिए प्रधानमंत्री मुद्रा लोन के तहत विकासखंड में फरवरी 2018 में रोजगार हेतु आवेदन किया था जिसका विकासखंड सरोजिनी नगर की तरफ से उसी महीने के अंत में मंजूरी मिल गई थी।

परंतु आवेदन की फाइल जो कि 200000 की थी जब वह सिकंदरपुर बंथरा स्थित स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया मे आई तो वहां की शाखा प्रबंधक आकांक्षा मिश्रा द्वारा लगभग 2 माह तक हर तरह के सर्वे करने के बाद सभी प्रकार के आवश्यक कागजात बनवा लिया गया।

परन्तु अब अंत में बैंक की शाखा प्रबंधक द्वारा सभी तरह के सर्वे करने के बाद यह कहा जा रहा है कि आपकी दुकान का अनुबंध लोन अवधि जो कि 5 साल का है वह चाहिए जबकि किसी भी किराए की दुकान का अनुबंध सिर्फ एक ही साल के लिए होता है वह पुनः किराएदार और दुकान मालिक की सहमति से बढ़ा करता है।

बैंक द्वारा लगातार इसी तरह की हीला-हवाली के चलते आवेदक लगातार तीन महीनों से विकासखंड एवं बैंक के चक्कर लगा रहा है।

परंतु उसका रोजगार के लिए लिया जाने वाला मुद्रा लोन बैंक द्वारा पास नहीं किया जा रहा है।

बैंकों द्वारा लगातार इसी तरह की हीला-हवाली के चलते सरकारी महत्वपूर्ण योजना मुद्रा योजना जिस में सक्षम शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मिल सके लगातार मजाक बनाया जा रहा है, जिससे सरकार की छवि लगातार धूमिल हो रही है।