षष्टम कात्यायनी : महर्षि पाराशर ज्योतिष संस्थान के ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश पाण्डेय के अनुसार

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कात्यायनी

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना ।
कात्यायनी शुभं दधाद्देवी दानवघातिनी।।
माँ दुर्गा के छठे स्वरूप का नाम कात्यायनी है।
ये महर्षि कात्यायन के यह पुत्री के रूप में उत्पन्न हुई थी। श्री मदभागवत पुराण के अनुसार व्रज की गोपियों ने भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए इन्ही की पूजा अर्चना किया था।
जिससे प्रसन्न होकर इन्होने सबको अभिष्ट प्राप्ति का वर दिया था।
एतदर्थ आज भी कन्याओं के विवाह में अवरोध उत्पन्न होने पर कन्यायें
इनकी उपासना कर अभीष्ट वर की प्राप्ति करती हैं।
इनकी भी मुद्रा शान्त है।

कात्यायनी

चार भुजायें हैं माथे पर मुकुट है दाहिने दोनों हाथो से वर मुद्रा में हैं व बायें हाथ में खड्ग व कमल पुष्प विराज रहा है इनका भी वाहन शान्त मुद्रा वाला शेर है इनकी उपासना द्वारा मनुष्यों को पुरषार्थ चतुस्टय की प्राप्ति होती है।
इनकी पूजा की विधि भी सरल व सुगम है।

विशेष- जिन कन्यायों के विवाह में विलम्ब हो रहा हो उन्हें चाहिए की आज के दिन स्नानोपरांत पीला वस्त्र धारण कर,पीले आसान पर बैठकर माँ  कात्यायनी की निष्ठा पूर्वक पूजन करें षोडशोपचार वा पंचोपचार जल, पन्चामृत, वस्त्र, चन्दन, अक्षत,  पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य लगाकर माँ कात्यायनी जी का ध्यान कर लाल चन्दन की माले पर कात्यायनी जी के मन्त्र” ॐ क्लीं कात्यायनि महामाये महायोगिन्य धीश्वरी नन्द गोप सुतं देवि पतिं में कुरुते नमः क्लीं ॐ” का 21 माला या 11 माला जप करके आरती करें व प्रसाद स्वयं ग्रहण करें।
ऐसा करने से मनोवांछित वर की प्राप्ति होती है।